गीत प्रेम का गा लूँगा

तुम हाथों से हवाओं को रोको,
मैं हृदय का दीप जला लूँगा,
तुम दिल की कोई धुन छेड़ो,
मैं गीत प्रेम का गा लूँगा।

 

जीवन में एक खालीपन है,
आओ तुम और उसको भर दो,
मेरे हृदय को हृदय से छूकर,
मंदिर सा पुनीत पावन कर दो,
तुम मन मंदिर में आओ तो,
मैं तुम्हें ही देवी बना लूँगा।
मैं गीत प्रेम का गा लूँगा।

नफरत करती इस दुनिया में,
आओ प्रेम संचार करें,
जहां सब एक-दूजे के बैरी,
वहां एक-दूजे से प्यार करें,
तुम हमकदम बन चलो अगर,
मैं भी कुछ कदम बढ़ा लूँगा।
मैं गीत प्रेम का गा लूँगा।

 

जब हम एक-दूजे को चाहें,
तो दुनिया को क्या समझाना है,
दो दिल जब भी जहां कहीं मिले,
तो बैरी रहा सदा ज़माना है,
तुम बस मेरे दिल की धड़कन समझो,
मैं दुनिया को समझा लूँगा।
मैं गीत प्रेम का गा लूँगा ॥

 

~ आस्तिक त्रिपाठी ‘शफ़्क़’


 

Image Source: Pixabay.com



 

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