रिक्शावाला





मंज़िल की तरफ़ आगे बढ़ता रहता हूँ,

 

हर पल पसीना बहाने के लिए तैयार रहता हूँ,

 

लोगों को मीलों पार कराता हूँ,

 

रिक्शा चला कर मैं अपनी रोटी खाता हूँ।

 

यहाँ से, वहाँ से, हर जगह से सवारी को ढूँढ लाता हूँ,

 

जहाँ वो कहे, वहाँ बिना रुके उसे पहुँचाता हूँ,

 

थोड़ा और आगे कह के, अपनी टाँगों को सांत्वना देता हूँ,

 

ये रिक्शा ही तो है, जिसे चला के मैं अपनी रोटी कमाता हूँ।

 

पिंटू और उसकी माँ के लिए, मेरे भी कुछ सपने हैं,

 

रोटी, कपड़ा और मकान की ज़रूरत को पूरा करना चाहता हूँ,

 

ये टायर, ये टोकरी, ये घंटी भी तो मेरे ही अपने हैं,

 

रिक्शा चला कर पिंटू को अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहता हूँ।

 

हर रात पिंटू कि माँ मेरा इंतज़ार करती है,

 

मेरी ही राह देखती देखती आहें भरती है,

 

रात के दो बजे तक वो सिलाई करती है,

 

मुझे खो ना दे, इस बात से वो डरती है ।

 

उस रात मैं घर जाने के लिए बहुत बेताब था,

 

पिंटू की माँ के लिए गजरा खरीदा था,

 

इस पापी पेट को अजब सी भूख लगी थी,

 

अम्मा के हाथ की सूखी रोटी, मुझे पनीर का स्वाद देती थी ।

 

वो काली रात थी, अमावास की रात थी,

 

आँखों में खुशियाँ लिए, मैं तेज़ी से घर जा रहा था,

 

पिंटू कि माँ मेरी बाट जोह रही थी,

 

पर मुझे क्या पता था, कि वो रास्ता कितना ही मन्हूस था ।

 

मेरे रिक्शा से एक नवाब्ज़ादे की गाड़ी टकराई थी,

 

वो अमीर बाप की औलाद शराब के नशे में चूर था,

 

उस रात मैंने अपनी दो वक्त कि रोटी गँवाई थी,

 

तीन साल के पिंटू का बाप अब अपाहिज हो चुका था।

 

वो शराबी पाँच सौ का नोट दे के जा चुका था,

 

पर मेरा तो जीवन ही अब ज़ाया हो चुका था।

 

किस्मत ने मेरे मुँह पे एक करारा थप्पड़ मारा था,

 

मेरी रिक्शा को मुझसे छीन के, मेरी ज़िंदगी को मुझसे छीना था,

 

अभी तो मैंने अपने ही सपने पूरे नहीं किए थे,

 

कहाँ मैं पिंटू और उसकी माँ के सपने पूरे करने के ख्वाब देखा करता था ।

 

नूर हसन दर्जी को एक चश्मा ले कर देना चाहता था,

 

बाजू वाली छोटी पिंकी को नया फ्रॉक ले कर देना चाहता था,

 

अपनी विधवा अम्मा को हरिद्वार कि यात्रा कराना चाहता था,

 

पिंटू को अच्छी से अच्छी शिक्षा देना चाहता था।
 




उस उपरवाले ने मुझसे मेरी रोटी छीन ली थी,

 

पर मैंने भी अभी अपनी हिम्मत नहीं गँवाई थी,

 

पिंटू को एक बड़ा अफसर बनाने का सपना जो उसकी माँ ने देखा था,

 

उसे पूरा करने का मैं अब भी जिगरा रखता था ।

 

पहले मैं अपने पैर चलाता था,

 

अब अपने हाथ चलाता हूँ,

 

पहले मैं रिक्शा चलाता था,

 

अब मैं तस्वीरें बेचता हूँ ।

 

~ हर्षिता कटारिया

 


Image Source: Pixabay.com


 

 


Share With Friends