रबर बनाने का नुस्खा





बचपन ज़िन्दगी का सबसे हसीं दौर होता है, है ना? एकदम मस्तमौला सा अंदाज़ होता है। खूब सारी शरारतें, ढेरों मौज़ मस्ती, खेल-हुडदंग, बिलकुल अल्हड़ सी, बेफिक्री ज़िन्दगी. बेफिक्री…? ना, फ़िक्र तो होती है।

 

कहीं लुका-छुपी में चोर न बनना पड़े, कहीं बोलिंग में ज़्यादा रन ना पिट जाएँ, कही स्कूल पहुचने में लेट ना हो जाएँ, सोनी मिस क्लास में खड़ा कर के कुछ पूछ ना लें… याद करने लगो तो ज़िन्दगी ख़त्म हो जाए पर बचपन की यादें ना ख़त्म हों।

 

बात तबकी है जब हम पाँचवे दर्जे में थे। उम्र उतनी ही थी जितने सालों में महाकुम्भ होता है। साइंस से ताअ्रूफ हो चूका था। खिलौने भी अब खुद ही बनाने लगे थे।

 

टिन के दो डब्बों और धागे से बना टेलीफ़ोन, टेप-रिकॉर्डर के मोटर और 1.5 वोल्ट की बैटरी से बनाया हुआ पंखा,पलाईवुड और जर्दे के डब्बे से बना भाप से चलने वाला जहाज़। इन्हीं सब ईनोवेटिव आइडियाज़ में से एक था रबर (eraser) बनाने का नुस्खा।

 

फार्मूला बहुत आसान था – पेंसिल के छिलके, ग्रेफ़ाइट के छोटे छोटे टुकड़े, थोड़ा सा दूध, चुटकी भर नमक और एक-दो बूंद फ़ेविकोल (रबर को नरम बनाने के लिए), इन सब मसालों को एक साथ मिला कर धीमी आंच पर 15 मिनट तक पकाना था, बस रबर तैयार। जब थ्योरी पूरी हो तो उसके प्रैक्टिकल एप्लीकेशन में देर नहीं करनी चाहिए, इसलिए हमने ये नुस्खा अपने फाइनेंसर (हमारे अब्बू जान) के सामने रखा। उन्होंने सुनते ही इस महान आईडिया में अपना एक भी पैसा लगाने से इंकार कर दिया।

 

पर हमें तो घर पे रबर बनाकर नटराज को पीछे करना था, हम कहाँ मानने वाले थे – ज़िद पर अड़ गए। सुबह शाम घर पे ही रबर बन जाने से कितने पैसे बचेंगे इसका हिसाब रटने लगे। थक हार के अब्बा को मानना ही पड़ा, माँ-बाप बच्चों के सामने मान ही जाते हैं।

 

एक शाम उन्होंने एक स्टोव मंगाया, एक प्याले में दूध और हमारी बताई सभी चींजों को मिला कर रबर बनाने का हुक्म जारी किया।

 

हम खुश, प्याले को आंच पर रख कर घड़ी में 15 मिनट गुजरने का इंतज़ार करने लगे, 10 मिनट में दूध खौलने लगा, थोडा सा नमक मिलाया. 12 मिनट…अब रबर जमना शुरु होना चाहिए.. 13 मिनट..कुछ हो नहीं हो रहा.. 15 मिनट..रबर जमा नहीं। थोड़ा सा फविकोल मिलाना चाहिए…20 मिनट… अब भी कुछ नहीं हुआ, कहीं नमक ज्यादा तो नहीं हो गया, पेंसिल का छिलका और मिलाना चाहिए.. या फिर ग्रेफाइट के कुछ और टुकड़े… 30 मिनट हो गए पर कुछ नहीं हुआ।

 

तभी एक आवाज़ आयी, स्टाकक्क्क्!
 




हमारे दाहिने रुखसार पर पंजे का निशान बन चुका था। आगे और क्या बताऊं, खुद सोच लें। अपने देश में इनोवेशन की कोई जगह ही नहीं है, आखिर एडिसन भी तो हज़ार बार नाकाम हुआ था, क्या यहाँ एक नाकामी दर्गुज़र नहीं की जा सकती थी?

 

खैर, अच्छी सी धुलाई के बाद समझाया गया की रबर एक पेड़ से निकलता है और सिंथेटिक रबर कैसे बनता है यह हम ऊपर के दर्जो में पढेंगे।

 

यहूदियों का एक तरीका होता है, अगर कोई बच्चा आग को छूता है तो कोई भी उसे रोकता नहीं है। ल लॉजिक ये रहता है की वह आग को छू कर खुद ही सीख लेगा की आग जलाती है। हमने भी सीख लिया था कि रबर कैसे नहीं बनती है।

 

विज्ञान के लिए छोटी मोटी कुर्बानियां देनी पड़ती हैं। हमारी तो बस बदन-तराशी हुयी थी। अब हमारे अंदर का वैज्ञानिक शक्तिमान और जूनियर जी की तरह हवा में उड़ने की तरकीब ढूंढने लगा। हम रास्ते में बायीं तरफ ही चलते थे निगाहें नीचें किये हुए, क्या पता कहाँ कोई अंगूठी गिरी पड़ी मिल जाये।

 

~ अहमद तनवीर खान

(How to make rubber)

 


Image Source: pixabay.com




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    Wow!! Amazing!!
    Bahut Dhairya se apne kore kagaz ko Shabdo se ranga hai!
    Dhanyvad, hme apne bachpan se rubaroo karne ke liye – Ahmad Tanveer Khan