मोक्ष





इस स्याह रात में, श्यामल आँखों में बादल काले क्यों छाते हैं है रागिनी घुली फिर स्वर साँसो के क्यों खुद को तन्हा पाते हैं

जो घेरे है मुझको वो प्यार है तेरा या कि मेरे मन की कुंठा है

इस कंटक शैया में चुभता कुछ है यह चिता है या कि चिंता है

वो दिन तेरी स्नेहिल बातों के सब मुझे याद अब आते क्यों हैं वो लफ्ज तेरे अक्षर- अक्षर मुझको यूँ चुभ जाते क्यों हैं

जग मुझको ताने देता है मैंने तोड़ी मर्यादा थी क्या जाने ये था अथक भरोसा तुझसे आस ही ज्यादा थी

तुझमे कृष्ण को देखा था राणा का तुझमें लेष न था

राम ही तुझको समझा था

रावण तू साधु भेस न था

फिर क्यों चंदन को विषधर के विष का यह निर्मम कलंक

धो देता इसे अपने जल से जो हुआ आज वह शून्य भी रंक

वह प्रेम नहीं था, गलती थी

अब एहसास मुझे भी होता है

जब सजा ये उसको देनी है

जो मेरे भीतर सोता है

जब माली ने त्यागा तुझको

यह धरती सींच क्या पाएगी कोइ तुझको छेड़े या तोड़ेगा तब तब यह कुम्हलाएगी

इस कारण क्षमा मुझे करना तुमको भी संग में ले जाती हूँ फल विश्वास और प्रेम का




मैं विष प्याला ही पाती हूँ

यह सोच वह उठ बैठी थी

फिर मृत्यु शैया पर सोने को तन पाषाण आँखें सूखी थीं कुछ बाकी न था रोने को

तभी सुबह की पहली किरण का अंबर तल भर में भ्रमण हुआ पंख एक तकिए के नीचे देख

उस चिड़िया प्यारी का स्मरण हुआ

जिसने लड़ कर हवा और पानी से घोंसला एक बनाया था

देख जिसे आंगन की डाली पर

मन हर्ष से मुस्काया था

संसार भर का संचार कर अकेली वह दाना लेकर आती थी

आशागत चुरूंगुन के समूह का स्वयं ही भार उठाती थी

बस यह संबल ही काफी था

उसकी खोई आशा लौटाने को

वह जाग चुकी थी जग को उसकी कलुषित निद्रा से जगाने को|

~ सुप्रिया तिवारी


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