लिटरेचर की मौत




*नोट- 3-4 जगह अभद्र भाषा का प्रयोग है।  इस चार अंगुल की रचना में कहीं भी मेरे उद्देश्य  पितृ-सत्ता का पुनरूत्थान एवं अश्लीलता नहीं, बल्कि स्वाभाविकता एवं स्वच्छंदता रहे हैं।*

 

 

“अरे लिटरेचर मर रहा है।”

 

 

सुबह से कस्बे में चारों तरफ यही झांव-झांव थी।  सब लोग इसी चर्चा मे लीन थे कि लिटरेचर मर रहा है तो कैसे, और मरेगा तो कब।  कुछ थे जो कह रहे थे कि लिटरेचर ‘खाली स्थान’ {कोई ‘सरनेम’ नहीं था उसका} जितना जल्दी दिव्य-गति (दुर्गति) को प्राप्त हो उतना बेहतर।  कस्बा इस खबर से धड़क रहा था।

 

 

शहर से लौटे नौजवान ने चश्मा नीचे कर आँखें तरेर कर पूछा, “लिटरेचर कौन चीज़? इस से हमको क्या मतलब?”

 

 

लिटरेचर कौन था और कहाँ से उग आया था इसका पता किसी को न था।  धर्म के मसीहा टाइप लोगों का कहना था कि भगवान ने जब देव और दानव बनाए थे तभी साहित्य भी बनाया था।  देवों ने अच्छाई पर अवैध क़ब्ज़ा कर लिया और दानवों ने बुराई को अपना फलसफा माना। और बची हुई रह गई थी कुटिलता, जो  साहित्य को सौंप कर भगवान ‘ससुराल सिमर का’ में सिमर की रक्षा करने में लग गए। और यही साहित्य बाद में लिटरेचर बुढ़वा के नाम से कुख्यात हुआ।

 

 

“अरे बूढ़ा क्या था, कुत्ता था। ” ज़मींदार ने मालिश करवाते हुए कहा।  “जब हम गुज़रते थे तो काटने को दौड़ता था।  शिष्टता तो उसे छू भी न गयी थी।  ऐसी गाढ़ी-गाढ़ी गालियाँ देता था कि क्या बतायें। ”

 

 

“देखिए आज किसको इतनी फ़ुर्सत है,  बैठ कर दो-तीन घंटे बुढ़उ की बकवास सुननें की? घर बैठे टीवी ऑन करिए, लिटरेचर से अच्छे कहानी कहने वाले मिलेंगे। ” एक टीवी चैनल के स्टार रिपोर्टर ने कहा।  और इस से पहले की और कुछ कह पाते,  ‘तीन, दो, एक, टेक’  की आवाज़ आई और उन्हें चेहरे पर फ़र्ज़ी मुस्कान चिपका कर कस्बे को डराने का काम शुरू करना पड़ा ।

 

 

और जुखुरबर्ग और मक्डोनाल्ड्स वाले कह, माफ़ कीजिए, एक्सप्रेस कर रहे थे कि कोई बूढ़ा अब मरेगा नहीं तो क्या अमर हो जाएगा! और आम लोग मन बनाए बैठे थे कि  मरता है तो मरे, अपनी बला से।  मदद करने गए तब मर गया तो फ़ालतू मे पुलिस का फेरा हो जाएगा। चुनावी हवा को सूंघ कर कस्बे के एक इच्छाधारी नेता ने दिन भर लाउड-स्पीकर पे भें-भें कर के साहित्य को श्रद्धांजलि दी और उनके चेलों ने बाबा के लिए शोक सभाएं आयोजित करवाई, पर  उसकी कोठी में कोई झाँकने तक नहीं गया।

 

 

और दिया-बाती होते ही लोगों ने शराब पीना, अपनी पत्नियों से पीटना-पिटाना एवं बच्चों की जिग्यासाओं  को कुचलना इत्यादि महत्वपूर्ण काम शुरू कर दिए।

 

 

जब आधी रात होने को आई तब साहित्य ‘खाली स्थान’ को अपना अंत निकट जान पड़ा।  एक साँस में उर्जा उधार ले  कर उसने आँखें खोलीं तो अपने चारों ओर लोगों का एक छोटा हुज़ूम जान पड़ा।

 

 

महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और कुछ युवा, मतलब वो सब जो यहीं के थे पर ये कस्बा उनका नहीं था, को आया देख लिटरेचर को तसल्ली हुई ।

 

 

पर मज़े की बात ये कि ये भीड़ इंसानों तक ही सीमित नहीं थी।  हलकू का कुत्ता जबरा, एक ठिठुरता हुआ गणतंत्र, कुछ घुन खाए शहतीर एवं अंधे युग, ‘एनो मीनिंग सू?’ जैसे सवाल और चचा ग़ालिब और टोबा टेक सिंह की ज़मीन जैसे पगलौट लिटरेचर की खाट को  निहायत कबीरी ‘लुक’ दे रहे थे।

 

 

जब लिटरेचर बाबा चल बसे तब सब हरिजन एक सुर में रोने-गाने लगे ।  जब इनका विलाप कुक्कुर-रुदन का आकार लेने लगा, तब इनके साथ बनारस से आए अस्सी-भदैनी ने पहले तो निश्चिंत होकर भंग छानी, फिर लगा सबको दुरदुराने।

 

 

“एक से बढ़ कर एक हैं।  झंड साले, जिसको कोई काम नहीं है इहा आके भोंगा पसार के रो रहा है।  अरे गाजे- बाजे के साथ मरघट पहुँचाओ इसे।”

 

 

“और गुरु तुम ! मरे तो अभी हो, जीते-जी कौन काम के रह गये थे।  चूतिया नहीं तो, वही घिसी-पिटी बातें, जा रहें हैं इक्कीसवीं सदी में और सिर पर वही बमपुलिस।”

 

 

“ई बूढ़ा वा भोसड़ी के अख़बार पर लाई-दाना फैलाय के एक मुठ्ठी  नमक और एक पाव मिर्चा बटोर के भकोसता था और ढेर क्रांति बतियाता था।  बढ़िया हुआ निपट गया।”

 

 

अस्सी भुनभुना रहा था और तब तक भुनभुनाता रहा जब तक लतिया-गरिया के सबको भगा नहीं दिया।  और सुबह होते ही बाबा की लाश को प्राईवेसी देने एवं ‘दिव्य-निपटान’ के लिए लोटा लेकर चल दिया।

 

 

क्या पूछते हैं? क्यूँ भगाया सबको अस्सी ने?

 

 

अरे अस्सी की आँखों में आँसू और बैकुंठ, दोनों का दर्शन सब्बे को मिल जाएगा तो निर्वाण-मोक्ष की बधिया नहीं बैठ जाएगी ।

 

 

समाप्त

 

 

1. “अस्सी और भाषा के बीच ननद-भौजाई और साली- बहनोई सा रिश्ता है ।  जो भाषा में गंदगी, गाली अश्लीलता और ना जाने क्या क्या देखते हैं, उन्हें अस्सी के भाषाविद् ‘परम’ (चूतिया का पर्याय) कहते हैं। ”

 

 

– काशीनाथ सिंह, ‘काशी का अस्सी’

 

 

2. पात्र सूची :

 

 

कुछ पात्र यहाँ वहाँ से उधार लिए गये हैं :

 

 

1. जबरा – पूस की रात (प्रेमचंद) ।

 

 

2. ठिठुरता हुआ गणतंत्र – हरिशंकर परसाईं की एक व्यंग्य रचना ।

 

 

3. घुन खाए शहतीर – बाबा नागार्जुन की ‘मास्टर’ कविता की प्रथम पंक्ति ।

 

 

4. अंधे युग – अँधा युग (धर्मवीर भारती) नाटक का नाम ।

 




5. ‘एनो मीनिंग सू?’ – मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास ‘ कुरू कुरू स्वाहा ‘ से उद्धरित ।

 

 

6. टोबा-टेक सिंह – मंटो का मशहूर अफ़साना ।

 

 

7. अस्सी-भदैनी – बनारस का अस्सी घाट ।  भाषा शैली मूलतः काशीनाथ सिंह के  ‘ काशी का अस्सी’ से प्रभावित।

 

 

~अवीक्षित प्रताप


 

Image Source: Pixabay.com


 


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