“भावना”





“भावना” – माँ की चहेती और मेरी जुड़वा बहन। कोई उसकी तारीफ़ किये बगैर रहता नहीं था, उसके गोरे गाल, घुंगराले बाल और सबसे अलग थी उसकी झील सी नीली आखें – हम दोनों में कुछ भी एक जैसा नहीं था- उसको मानो भगवान ने फुर्सत से तराशा हो। “सर्वगुणसंपन्न”।

 

बचपन में गोद में उठाने के लिए, पढ़ने, क्लास फ़ोटो में मैडम के बगल में बैठने, सबसे मशहूर लड़की का ख़िताब पाने – सब में वो हमेशा जीती – मैं वो थी जो किनारे खड़े होकर ये सब देखती।

 

दिन गुज़रे और हमने जवानी की देहलीज़ पर कदम रखा। भगवान को मुझ पर दया आईऔर लोगों कि नज़र मुझ पर भी पड़ी। पर भावना की तो बात ही अलग थी। उसके रूप की कशिश, चंचल अदाओं का दीदार करने के लिए लड़के बेताब रहते थे। बचपन के उस दबे गुस्से पर यही सब बातें हवा देती थीं।

 

सब बदल गया जब पल्लव ने कॉलेज में कदम रखा। उसको देखते ही पहली बार एहसास हुआ कि लोग प्यार से इतना प्यार क्यों करते हैं, उस पल में मेरी पूरी ज़िन्दगी हसीन हो गयी।
 




पल्लव मेरा सबसे अच्छा साथी बन गया और एक साल बाद हम कॉलेज की दीवारों के किस्से।

 

भावना का कोई बॉयफ्रेंड नहीं था और इस बात पर कहीं न कहीं मुझे अपनी जीत लगती थी। पल्लव जब पहली बार भावना से मेरी बर्थडे पार्टी पर मिला तो उसने भावना कि तारीफ़ों के पुल बाँध दिए।

 

पल्लव और भावना अक्सर मिलने लगे; और वही पुरानी जलन मुझे फिर घेरने लगी। कॉलेज में अक्सर वो दोनों हँसते खिलखिलाते कभी हाथ में हाथ डाले मुझे बात करते दिख जाते और पूछने पर हमेशा टाल जाते। हद पार उस दिन हुई जब एक लड़के ने मुझे propose किया और बोला – अब तो पल्लव भावना संग है तुम्हें भी अब आगे बढ़ना चाहिए।

 

उस दिन पल्लव से मेरा भयानक झगड़ा हुआ और मैंने उसे भावना से दूर रहने को कहा। कुछ दिनों में सब पहले जैसा हो गया।

 

एक दिन भावना घर से चली गयी; एक चिठ्ठी लिख कर कि वो अपना एक मुकाम बनाना चाहती है और इस शहर को छोड़ कर मुंबई जा रही है। हम दोनों माँ के जाने के बाद वैसे भी बिखर गए थे और पल्लव की वजह से मुझे उसके जाने का गम भी नहीं हुआ।

 

पल्लव और मेरी शादी में भावना नहीं आई तो पल्लव को बुरा लगा और उसने भी भावना के बारे में पूछना बंद कर दिया।

 

दो साल बाद मुझे पता चला कि मैं माँ बनने वाली हूँ, हमारी ख़ुशी का ठिकाना न था- मुझे लगा आखिर जिन सारी खुशियों पर मेरा हक था वो सब आज मेरे पास है।

 

डिलीवरी के बाद नर्स ने मुझे मेरी बेटी थमाई तो उसे देखते ही मेरी सांस रुक गयी।

 

वही गोरे गाल, वही नीली आखें- वही नीली आंखें जो मुझे रिवाल्वर लिए डर से देख कर रही थीं। वही आखें जो रो-रो कर मुझे बख्शने कि मिन्नंतें कर रही थी और वही आखें जिन्हें मैंने आखरी बार दफ़न करते वक़्त हमेशा के लिए बंद किया था।

 

आखिर वो फिर जीत गयी…

 

~ सुष्मिता सोनी

 

 


Image Source: pixabay.com


 

 


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