दो दिन का अमेरिका





दो दिन की लगातार बारिश ने गर्मी से तपते इंसान को आनंद की अनुभूति तो करायी ही साथ ही बिजली विभाग वाले भी लोकोपकारी प्रतीत हुए, भले ही कारण रहा होगा कि तापमान में गिरावट के कारण बिजली की खपत कम हुई हो।

 

लगातार बारिश और उस पर निर्बाध रूप से आती हुई बिजली, प्रतीत हो रहा था जैसे इंद्र देव और बिजली विभाग वाले एक साथ में बार्सिलोना और रियल मेड्रिड के बीच फुटबॉल मैच का आनंद उठा रहे हो और इधर सप्लाई चालू कर के उधर मग्न हों। पड़ोस के चाचा जी तो आत्मविभोर होकर हमारे मंत्री जी का गुणगान भी करने लगे थे । लोगों की ख़ुशी का आलम तो ये था जैसे भारत हमारा अमेरिका बन गया हो, कमबख्त बायोलॉजी और जियोग्राफी के सिद्धांत भी घनचक्कर बन जाएं।

 

भला हो म्युनिसिपेलिटी वालों का, मॉनसून के आगमन के पूर्वसूचना के उपरांत भी सरकारी विभाग के जडत्व के नियम का सहर्ष पालन कर रहे थे । झमाझम बारिश ने सड़क और नाले में कोई फर्क ही नहीं छोड़ा था,न कोई राजा न कोई रंक ― सभी एक समान। समय कितना भी बदल गया हो ग़ालिब ! वो कागज की कश्ती नहीं बदली थी आज भी । हाँ इतना फर्क जरुर पड़ा था पहले अमीर और गरीब सभी की कागज की नावें चलती थी और आज अमीर की सिर्फ असली वाली चलती है और गरीब की वही कागज वाली, हालांकि नावें आज भी ज़िंदा हैं। उन बच्चों को नाव चलाता देख अंतर्मन का आनंद जो कि उत्कर्ष की चरम सीमा पर पहुँच कर हिलोरे मार रहा था फिसलने पर धडाम से गिरा । आहा । पहने हुए कपड़े धुलधुसरित नहीं बल्कि कीचड कलुषित हो गये थे और मैं कीचड में कमल नहीं वरन बगुला लग रहा था ।
 




आनंदमय दो दिन बीतने के बाद तीसरे दिन आकाश से बादल ऐसे गायब थे जैसे गधे के सिर से सींग । रात में तीन बजे नींद खुली तो लाइट का नामोनिशान नहीं था और सारा बदन पसीने से चिप चिप कर रहा था । शायद लाइट गए काफ़ी देर हो चुकी थी और इन्वर्टर का बैकअप भी खत्म था । कुर्सी लेकर बालकनी में आ गया और टांगे सामने रेलिंग पर फैला ली । आसपड़ोस के लोग शायद जागे हुए थे ― बातचीत के अस्पष्ट स्वर मेरे कानो में घुल रहे थे , रात के सन्नाटे की वायु में ध्वनि की गति शायद और ज्यादा हो गयी थी । दो घंटे ऊँघने के बाद आँख खोली तो थोड़ा उजाला फ़ैल गया था, सूर्य देव भी नहा धो कर आकश में विराजमान होने को आतुर लग रहे थे ।

 

अचानक आयी कड़क चाय की महक से शरीर का रोम रोम पुलकित हो गया, महक भी ऐसी थी जैसे खालिश दूध की कड़क चाय को काफी देर उबला गया हो और फिर वो उफान मार कर बर्तन में बनी चारदीवारी के बंधो के ऊपर से गुज़र कर लाल तपते कोयले पर गिरी हो ।

 

पडोस में कहीं चाय बन रही थी शायद और बनाने वाला नींद न पूरी होने के कारण ऊँघ रहा हो, खैर पीछे का घटनाक्रम जो भी हो । अनायास ही मैं गुनगुनाने लगा “आज मदहोश हुआ जाये रे मेरा मन …।” नेपथ्य से मित्र की आवाज आई, “बस गाते ही रहना तुम, कह क्यों नहीं देते उससे दिल की बात ।”

 

मैंने धीरे से जवाब दिया : “इज़हार ए मोहब्बत इतना जरुरी तो नहीं, एक तरफ़ा आशिकी का भी मज़ा अलग है ।”

 

चाचा जी की दूर से आती आवाज सुनाई दी “अमा मियां ! दो ही दिन को अमेरिका बनाया था क्या ?”

 

~आदर्श द्विवेदी

 


Image Source: Pixabay.com


 



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