बदलाव





“तुम्हारी पीढ़ी भी काफ़ी अजीब है।

 

“महेंगे तोहफ़ों और फॉरवर्ड किये हुए संदेशों में प्रेम ढूंढती है।

 

“आखिर प्रेमिका के हर रोज़ छत पर आने का इंतज़ार करना क्या होता है, तुम क्या जानो? एक गुलाब मिल जाने से उसके चेहरे पर जो लाली आ जाती है, उस लाली को तुम क्या जानो?

 

“भूले भटके कभी फ़ोन अगर कहीं रह जाए, तुम्हारे लिए तो मानो क़यामत है, हर शनिवार उनकी चिट्ठी आने का इंतज़ार करना क्या होता है ये तुम क्या जानो?
 




“नई पीढ़ी काफ़ी आगे बढ़ चुकी है। आज कल प्यार हो न हो, तुम्हारे लिए तो शरीर की प्राथमिकता ज़्यादा है। किसी व्यक्ति को उसके देह मात्र के लिए प्रेम ना करके, उसके मन को चाहना क्या होता है, ये तुम क्या जानो?

 

“और सालों के सपने जब माता पिता के एक ‘ना’ की वजह से बिखर जाते हैं, तब जाती और धर्म के प्रति जो गुस्सा, जो घृणा मन में घर कर जाती है, वह तुम क्या जानो!”

 

इतना कह कर उन्होंने कुछ सोचते हुए कहा, “… नहीं, उस घृणा को तो तुम जानते ही होगे। आखिर दुःख तो इसी बात का है कि कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं।”

 

दादाजी बड़ी मायूसी से मुस्कुरा दिए।

 


Image Source: pixabay.com


 


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