Posts by Kallol Mukherjee

भारत की हत्या

“कभी कभी लगता है… लगता है कि वो है ही नहीं।” “देखो उसके घर देर है अंधेर नहीं।” “हुह!!” एक महीने पहले बापू “हुह!!” को अपना आखरी शब्द बनाकर दिल्ली रवाना हुए थे। उनके इस “हुह!!” में निराशा छिपी हुई थी या नाराज़गी मेरी समझ से बाहर है। उस दिन अचानक गुस्से में घर आये, खाट के नीचे से संदूक निकाला, एक बैग में दो चार कपड़े डाले और कह

*यादों का सफ़र*

  “मेट्रो या ऑटो?” “ऑटो।” “वैसे मेट्रो में भी जा सकते हैं, अभी रात के 11 ही बजे हैं। भीड़ भी नहीं होगी और एअरपोर्ट एक्सप्रेस वे से 30 मिनट में एअरपोर्ट पहुँच भी जायँगे।” “नहीं, ऑटो!” उसने बात को कोई तूल ना देते हुए कहा। “ज़िद्दी.. तुम बिलकुल नहीं बदली।” पूरे आठ साल बाद मिले थे। एम.बी.ए साथ में करने के बाद एक ही कंपनी में काम करना जैसे